हिमगिरि न्यूज —- यह बात वाकई गंभीर और जमीनी धरातल से जुड़ी हुई चिंता को उजागर करती है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, नई-नई योजनाओं की घोषणाएं करना आसान होता है, लेकिन असली परीक्षा पुरानी योजनाओं के रिपोर्ट कार्ड और उनके क्रियान्वयन से होती है।
हमने यंहा पर मुख्य बिंदु उठाए हैं, जो राज्य के विकास मॉडल पर सीधे सवाल खड़े करते हैं:
- आईटी पार्क की हकीकत: देहरादून स्थित आईटी पार्क का उदाहरण सामने है। जिस विजन के साथ इसे बनाया गया था कि बड़ी टेक कंपनियां आएंगी और स्थानीय युवाओं को हाई-टेक रोजगार मिलेगा, वैसा धरातल पर नहीं दिख पाया। चुनिंदा और छोटी कंपनियों के सहारे चलने की वजह से इसका व्यापक लाभ राज्य को नहीं मिला।
- स्थानीय बनाम बाहरी रोजगार: आईटी और औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानीय युवाओं के कौशल विकास (Skill Development) और उनके लिए निश्चित रोजगार के अवसर प्राथमिकता पर होने चाहिए थे। जब स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं मिलती, तो इस तरह के पार्कों की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
- इन्वेस्टर समिट और धरातली परिणाम: लाखों करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) साइन होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि उनमें से धरातल पर कितनी पूंजी उतरी? योजनाओं में पारदर्शिता की कमी और छोटे स्तर पर हुए घोटालों/अनियमितताओं की खबरों से जनता का भरोसा टूटता है।
- घोषणाएं बनाम क्रियान्वयन: जब तक पुरानी नीतियों की समीक्षा नहीं होगी और मौजूदा आईटी व औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक “युवा आयोग औद्योगिक पार्क” जैसी नई घोषणाओं को जनता केवल एक चुनावी स्टंट या महज कागजी योजना के रूप में ही देखेगी।
उत्तराखंड के सतत विकास के लिए जरूरी है कि सरकार केवल नई घोषणाएं करने के बजाय:
- श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे कि पूर्व के इन्वेस्टर समिट और आईटी पार्क से कितने स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार मिला।
- स्थानीय प्रतिभाओं का पलायन रोकने के लिए नीतियां केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर लागू करे।
- नई योजनाओं से पहले पुरानी योजनाओं की कमियों को सुधारे और व्यवस्था में पारदर्शिता लाए।
आप सभी अपनी राय रखे और बताये क्या पूर्व मे चली आ रही योजनाओं से राज्युय के युवाओं का कुछ भला हुआ नही ना तो चुप मत रहिये आवाज उठाइये अपने आने वाले कल के लिये ।
