हिमगिरी न्यूज़ — खबर सच हैं — डांडी कांठी कलब नें छेत्रीय लोगो के साथ मिलकर दून के रिंग रोड स्थित लाडपुर में इगास (बग्वाल) हर्षोल्लास के साथ मनाई। रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ लोगों ने ढोल-दमाऊं की थाप और रणसिंघे की धुन पर भैलो खेला। लोक गायक सौरभ मैठाणी, बीके सामंत, लोक गायिका रेशमा शाह, मंजू सुंदरियाल, लोक गायक विवेक नौटियाल एवं जौनसारी लोक गायक मनोज सागर ने एक के बाद एक दमदार प्रस्तुति से इगास के उल्लास में रंग भरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

शुक्रवार को इस कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने किया। धूल पाथा पूजन के बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शुरू हुईं। मुख्य अतिथि पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि इगास उत्तराखंड का मारंपरिक पर्व है। यह पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान है।’ इसको संरक्षित रखना जरूरी है। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम में आए अतिथियों और लोगों ने ढोल दमाऊं की थाप पर भैलो खेला। इसके समापन पर कल्यो, अरसा और रोट वितरित किया गया। इस मौके पर राज्य आंदोलनकारी रविंद्र जुगरान, इंजीनियर सुभाष पंवार, बिरेन्द्र र रावत, पूर्व पार्षद नरेश रावत आदि नें कार्यक्रम में प्रतिभाग किया।

इगास बग्वाल कार्यक्रम में लोक कलाकारों ने दमदार प्रस्तुतियों से समां बांधा। इगास पर आधारित लोक गीतों ने खूब तालियां बटोरी। दर्शकों ने नृत्य भी किया। लोक गायक सौरभ मैठाणी ने ढोल दमौ की थाप पर मकशबाजा बजला…, हिट मधुली मेरा पहाड़ देखिक आली इगास बग्वाल.. और मैं पहाड़ों को रैबासी… की सुंदर प्रस्तुति से इस कार्यक्रम पर चार चांद लगा दिए। कुमाउनी लोक गायक बीके सामंत तु ऐजा ओ पहाड़… और थलकी बाजार… गीत गाया। वहीं, रेशमा शाह ने भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा। लोक गायक विवेक नौटियाल और जौनसारी लोक गायक मनोज सागर ने भी शानदार प्रस्तुति दी।

उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों में में दीवाली के 11 दिन बाद मनाए जाने वाले इगास को लेकर कई मान्यताएं हैं।  पुराने लोग ओर उत्तराखंड के इतिहास के जानकार लोगो की मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम जब रावण का वध करने के बाद अयोध्या पहुंचे थे तो इसकी सूचना उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में 11 दिन के बाद मिली और तब यहां दीपावली मनाई गई।  नरेश रावत पूर्व पार्षद ओर इस कार्यक्रम के संयोजक बताते हैं कि मान्यता के अनुसार करीब 400 साल पहले वीर भड़ माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में उत्तरकाशी, टिहरी, जौनसार, श्रीनगर समेत तमाम क्षेत्रों से योद्धा बुलाकर सेना तैयार की गई। इस सेना ने तिब्बत पर हमला बोलते हुए वहां सीमा पर मुनारें गाड़ीं। बर्फबारी के कारण रास्ते बंद हो गए। उस साल दीपावली के 11 दिन बाद माधो सिंह भंडारी युद्ध जीतकर लौटे तो पूरे क्षेत्र में दीपावली मनाई गईं, जिसे इगास बग्वाल कहा गया, तब से कांर्तिक महीने की एकादशी पर यह पर्व मनाया जाता है।

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