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हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण काल माना जाता है. इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दौरान हमारे पितर धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से अन्न, जल और दान की अपेक्षा रखते हैं. इस वर्ष पितृ पक्ष 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चल रहा है. पूरे 15 दिनों तक लोग श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण कर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.

ज्योतिषाचार्यो — के अनुसान, इस अवधि में सात्विक जीवनशैली और संयम रखना अत्यंत आवश्यक है. पूर्वजों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ चीजों से परहेज करना जरूरी माना गया है. आइए जानते हैं पितृ पक्ष में कौन-सी चीजें वर्जित हैं.
मांसाहार से परहेज
पितृ पक्ष में मांसाहार का सेवन करना निषिद्ध है. मांस, मछली, अंडे जैसे आहार तामसिक माने जाते हैं. इन्हें खाने से पूर्वजों की आत्मा की शांति में बाधा आती है.

शराब और नशे की मनाही
इस पावन समय में शराब, सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू और किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन महापाप माना गया है. नशा करने से श्राद्ध कर्म की पवित्रता भंग होती है और पितरों की कृपा नहीं मिलती.
प्याज और लहसुन वर्जित
प्याज और लहसुन को पूजा-पाठ में अशुद्ध माना जाता है. पितृ पक्ष में इनका सेवन करना श्राद्ध और तर्पण की शुद्धता को भंग कर सकता हैं।
हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण काल माना जाता है. इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दौरान हमारे पितर धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से अन्न, जल और दान की अपेक्षा रखते हैं. इस वर्ष पितृ पक्ष 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चल रहा है. पूरे 15 दिनों तक लोग श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण कर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.
उड़द और मसालेदार दाल से दूरी
उड़द और मसूर की दाल के साथ-साथ अधिक मसालेदार भोजन भी पितृ पक्ष में वर्जित है. इन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है और इनका सेवन पितृ दोष का कारण बन सकता है.
कुछ सब्ज़ियों का सेवन न करें}
मूली, गाजर, शलजम और खीरे जैसी सब्ज़ियां तामसिक प्रवृत्ति की मानी जाती हैं. इसलिए पितृ पक्ष के दौरान इनका सेवन नहीं करना चाहिए.

सात्विक जीवनशैली अपनाएं
ज्योतिषाचार्यो का कहना है कि इस काल में सात्विक आहार, संयमित व्यवहार और पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए. प्रतिदिन सूर्य को जल अर्पित करना, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान देना तथा श्राद्ध कर्म को विधिपूर्वक करना पूर्वजों को प्रसन्न करता है.

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